घर की कविता -
"महत्वाकांक्षा की पुकार"
जो देती है हवा
जिंदगी को हर सॉंस
के साथ।।
हाँ
इन उचाईयो से झाँकने पर
,कुछ लोग तुम्हे छोटे
लगेंगे।।
खुश
हो लो उन्हें देखकर
, बस जल्द ही वो
तुमको मिलेंगे।।
शर्त
ये है कि तुम
अब न बढ़ोगे।
जहाँ
तुम खुश नहीं होंगे
, पर और ऊपर का
रास्ता मिलेगा।
हाँ
- - यहॉं पर दर्द कुछ
सस्ता मिलेगा ।।
अब तू रुकेगा कहाँ ? ये तुझ पर है।
अब तू चल ? या रुक ? ये तुझ पर है।।
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