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            घर   की   कविता  - " महत्वाकांक्षा की   पुकार"   महज़ रास्ते चलते नहीं कभी   , इन पर चलने वाले पथिक चाहिए ।   वही होंगे विजय , जिनको कुछ और अधिक चाहिए।।   आकांछा ही तो है जो बनती है आशा और   विश्‍वास   के साथ। जो देती है हवा जिंदगी को हर सॉंस के साथ।।   बढ़ने दो इसे रास्ते छोटे लगेंगे। हाँ इन उचाईयो से झाँकने पर , कुछ लोग तुम्हे छोटे लगेंगे।। खुश हो लो उन्हें देखकर , बस जल्द ही वो तुमको   मिलेंगे।। शर्त ये है कि तुम अब न बढ़ोगे।   या - -  - चल पड़ो कुछ और , अब होगा वो दौर। जहाँ तुम खुश नहीं होंगे , पर और ऊपर का रास्ता मिलेगा। हाँ - - यहॉं   पर दर्द कुछ सस्ता मिलेगा ।। अब  तू रुकेगा कहाँ    ?    ये तुझ पर है। अब  तू चल ? या रुक   ?      ये तुझ पर है।।           ...