" घर की कविता " - a micro niche of the society
घर के खाने में एक बात होती है...
बड़ी होटलों सी कलर वाली तडके की सब्जी नहीं होती ,
पर सच्चाई ऐसी , जो मन को तृप्ति और तन को ऊर्जा देती है...
डॉक्टरी की कौन सी किताब में ये पढ़ाया जाता होगा कि ....
तबियत नासाज हो तो, सिर्फ घर के खाने की ही हिदायत दी जाती है ..
मेरी कविता भी न होगी ... कलर वाले तडके सी सुंदर
पर सच्चाई जीवन की तो इसकी नब्ज़ में होगी...
कुछ इस तरह अपनों के लिए." घर की कविता "सज़ी होगी
My first creation of Ghar ki Kavita
ReplyDeleteAmazing!! 😲✨
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