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            घर   की   कविता  - " महत्वाकांक्षा की   पुकार"   महज़ रास्ते चलते नहीं कभी   , इन पर चलने वाले पथिक चाहिए ।   वही होंगे विजय , जिनको कुछ और अधिक चाहिए।।   आकांछा ही तो है जो बनती है आशा और   विश्‍वास   के साथ। जो देती है हवा जिंदगी को हर सॉंस के साथ।।   बढ़ने दो इसे रास्ते छोटे लगेंगे। हाँ इन उचाईयो से झाँकने पर , कुछ लोग तुम्हे छोटे लगेंगे।। खुश हो लो उन्हें देखकर , बस जल्द ही वो तुमको   मिलेंगे।। शर्त ये है कि तुम अब न बढ़ोगे।   या - -  - चल पड़ो कुछ और , अब होगा वो दौर। जहाँ तुम खुश नहीं होंगे , पर और ऊपर का रास्ता मिलेगा। हाँ - - यहॉं   पर दर्द कुछ सस्ता मिलेगा ।। अब  तू रुकेगा कहाँ    ?    ये तुझ पर है। अब  तू चल ? या रुक   ?      ये तुझ पर है।।           ...

माँ क्या तू शुन्य है ?

माँ तेरे भाव का भाव अनंत है। (भाव =भावना , भाव = मूल्य ) तूने मुझे चुना , वो भी तब ,जबकि मैं शून्य था। मुझे गढ़ा ,किए बड़ा ,हर दर्द मेरे लिए सहा। इस शून्य को तूने अनंत से मिला दिया। शून्य से अनंत के सफर को कराने वाली माँ। और खुद को कभी शून्य से ऊपर ही नहीं माना।   शायद ही धरती का कोई लाल होगा ,जिसे ये मालूम नहीं की तू अनंत है। इसलिए तो यकायक , एक दिन के लिए , चहु ओर तू बन जाती अनंत है।   बाकि दिन क्यों समझते हैं तुझे शुन्य सा ? माँ क्या तू सच में शून्य है ?

घर की कविता - "राम वन को आ गये"

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घर की कविता – " पैर पर अंगुलिया भारी”

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घर की कविता – “आखरी खुदा “

    माँ से किसने माँगा ? पर प्यार मिला कुछ गलत तुमने किया - जो इंकार मिला ढूंढते हो जिसे मंदिर और मजारो में टक-टकी आंखों से तुमको ढूंढती वो पास जाओ - इस जनम की वही आखिरी खुदा है

" घर की कविता " - a micro niche of the society

घर के खाने में एक बात होती है.. . बड़ी होटलों सी कलर वाली तडके की सब्जी नहीं होती , पर सच्चाई ऐसी , जो मन को तृप्ति और तन को ऊर्जा देती है ... डॉक्टरी की कौन सी किताब में ये पढ़ाया जाता होगा कि  .... तबियत नासाज हो तो , सिर्फ घर के खाने की ही हिदायत दी जाती है  .. मेरी कविता भी न होगी  ...  कलर वाले तडके सी सुंदर पर सच्चाई जीवन की तो इसकी नब्ज़ में होगी ... कुछ इस तरह अपनों के लिए. " घर की कविता " सज़ी होगी