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" घर की कविता " - a micro niche of the society
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घर के खाने में एक बात होती है.. . बड़ी होटलों सी कलर वाली तडके की सब्जी नहीं होती , पर सच्चाई ऐसी , जो मन को तृप्ति और तन को ऊर्जा देती है ... डॉक्टरी की कौन सी किताब में ये पढ़ाया जाता होगा कि .... तबियत नासाज हो तो , सिर्फ घर के खाने की ही हिदायत दी जाती है .. मेरी कविता भी न होगी ... कलर वाले तडके सी सुंदर पर सच्चाई जीवन की तो इसकी नब्ज़ में होगी ... कुछ इस तरह अपनों के लिए. " घर की कविता " सज़ी होगी