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Showing posts from March, 2022

घर की कविता - "राम वन को आ गये"

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घर की कविता – " पैर पर अंगुलिया भारी”

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घर की कविता – “आखरी खुदा “

    माँ से किसने माँगा ? पर प्यार मिला कुछ गलत तुमने किया - जो इंकार मिला ढूंढते हो जिसे मंदिर और मजारो में टक-टकी आंखों से तुमको ढूंढती वो पास जाओ - इस जनम की वही आखिरी खुदा है

" घर की कविता " - a micro niche of the society

घर के खाने में एक बात होती है.. . बड़ी होटलों सी कलर वाली तडके की सब्जी नहीं होती , पर सच्चाई ऐसी , जो मन को तृप्ति और तन को ऊर्जा देती है ... डॉक्टरी की कौन सी किताब में ये पढ़ाया जाता होगा कि  .... तबियत नासाज हो तो , सिर्फ घर के खाने की ही हिदायत दी जाती है  .. मेरी कविता भी न होगी  ...  कलर वाले तडके सी सुंदर पर सच्चाई जीवन की तो इसकी नब्ज़ में होगी ... कुछ इस तरह अपनों के लिए. " घर की कविता " सज़ी होगी